संस्कृति, शिक्षा एवं धर्म के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद का दर्शनः एक दर्शन शास्त्रीय विवेचन
महेन्द्र कुमार प्रेमी
शोध-छात्र (पीएच. डी.) पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर,(छ.ग.) -492010
सारांश
स्वामी विवेकानन्द भारत के बहुमूल्य रत्न एक जीवित क्रांति के मशाल थे, एक व्यक्ति नही एक चमत्कार थे। आज से प्रायः एक सदी पहले पराधीन और पददलित भारत के जिस एकाकी और अकिंचन योद्धा संयासी ने हजारों मील दूर विदेश में नितांत अपरिचितों के बीच अपनी ओजमयी वाणी में भारतीय धर्म-साधना के चिरंतन सत्यों का जयघोष किया। स्वामी विवेकानन्द सामायिक भारत में उन कुशल शिल्पियों में हैं जिन्होने आधारभूत भारतीय जीवन-मूल्यों की आधुनिक अंतराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में विवेक संगत व्याख्या की। स्वामी विवेकानन्द के जीवन कोश में भारतीय नव-निर्माण के उर्वर बीच यत्नपूर्वक संकलित है ही, उसमें पीड़ित और जर्जरित मानवता के पुनर्सृजन की कार्यात्मक, कार्यसाधक योजना भी सम्मिलित हंै। भारत के लिए स्वामी जी के विचार चिंतन और संदेश प्रत्येक भारतीय के लिए अमूल्य धरोहर है तथा उनके जीवन शैली और आदर्श प्रत्येक युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत्र हैं। स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन का प्रधान लक्ष्य भारत के नैतिक तथा सामाजिक पुनः उद्धार के लिए उन्होंने एक अनुप्रेरित कार्यकर्ता के रूप में अपना संपूर्ण जीवन खपा दिया । स्वामी जी भारतीय संस्कृति, शिक्षा तथा धर्म के समग्रता के संबंध ने आज हमारे सामने विशेषकर युवा पीढ़ी के लिए यह आह्रवान कि-’’ मानव स्वाभव गौरव को कभी मत भूलो”। हममें से प्रत्येक व्यक्ति यह घोषणा करें कि - मैं ही ईश्वर हॅू , जिससे बड़ा कोई न हुआ है और न ही होगा। उनके विचारानुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना मात्र नही है अपितु उसका लक्ष्य जीवन चरित्र और मानव का निर्माण करना होता है। चूंकि वर्तमान शिक्षा उन तत्वों से युक्त नहीं है अतः वह श्रेष्ठ शिक्षा नहीं है। वे शिक्षा के वर्तमान रूप को अभावात्मक बताते थे, जिसमें विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति का ज्ञान नही होता। भारत की गुरू-शिष्य परंपरा जिसमें विद्याथर््िायों तथा शिक्षकों में निकटता के सबंध नया संपर्क रह सकें तथा विद्यार्थियों में पवित्रता ज्ञान,धैर्य, विश्वास, विनम्रता आदि के श्रेष्ठ गुणों का विकास हो सके। वे धर्म के सबंध में किसी एक धर्म को प्राथमिकता नही देते थे , स्वामी जी मानव धर्म के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ थे। उन्होने धार्मिक संकीर्णता से उपर उठते हुए यह घोषणा की कि ’’ प्रत्येक धर्म, सम्प्रदाय जिस भाव में ईश्वर की आराधना करता है , मैं उनमें से प्रत्येक के साथ ठीक उसी भाव से आराधना करूंगा। स्वामी जी के अनुसार बाईबिल, वेद, गीता, कुरान तथा अन्य धर्मग्रथ समूह मानो ईश्वर के पुस्तक में के एक-एक पृष्ठ हंै। वे प्रत्येक धर्म को महत्व देते थे तथा उनके सारभूत तत्वों को जो मानव जीवन को उनका चरित्र तथा ज्योति प्रदान करने में सक्षम हो को अपनाने का आहवान करते थे जिसे एक नाम दिया गया ’’ सर्व धर्म सम्भाव’’। उन्होंने प्रत्येक धर्म के विषय में कहा कि कोई व्यक्ति जन्म से हिन्दू, ईसाई, मुस्लिम, सिक्ख या अन्य धर्म के नहीं होते। उनके अपने माता-पिता, पूर्वज जिस संस्कृति, संस्कार या परंपरा से जुडे़ रहते हंै वे उसे सीखते और आज्ञा पालन करने वाले होते हैं।मानव से बढ़कर और कोई सेवा श्रेष्ठ नही है और यहीं से शुरू होता है वस्तविक मानव की जीवन यात्रा। हमें आज आवश्यकता है स्वामी जी के आदर्शो पर चलने हेतु दृढ़ प्रतिज्ञ होने, उनके शिक्षा, विचार संदेश तथा दर्शन को साकार रूप में अपना लेने की। स्वामी जी के जीवन शैली को आत्मसात करके जन-जन में एकता प्रेम,और दया की नंदियाॅ बहाकर नए युग की शुरूआत करने की। तो आईये जाति, धर्म, सम्प्रदाय, पंथ और अन्य संकीर्ण मानसिकता से उपर उठकर एक-दूसरे का हाथ थामकर माॅ भारती को समृद्धि ,विकास और उपलब्धि की ओर ले जाए।
प्रस्तावना
स्वामी विवेकानंद जी भारतीय और विश्व इतिहास के उन महान व्यक्तियों में से हैं जो राष्ट्रीय जीवन को एक नई दिशा प्रदान करने में एक अमृत धारा की भांति हैं । स्वामी जी के व्यक्तित्व और विचारों में भारतीय संस्कृति परंपरा के सर्वश्रेष्ठ तत्व निहित थे। उनका जीवन भारत के लिए वरदान थे। स्वामी जी का संपूर्ण जीवन माॅ भारती और भारतवासियों की सेवा हेतु समर्पित था । उनका व्यक्तित्व विशाल समुद्र की भाॅति था। वे आधुनिक भारत के एक आदर्श प्रतिनिधि होने के अतिरिक्त वैदिक धर्म एवं संस्कृति के समस्त स्वरूपों के उज्जवल प्रतीक थे । प्रखर बुद्धि के स्वामी और तर्क विचारों से सुसज्जित जलते दीपक की तरह प्रकाशमान थे । उनके अंतःकरण में तेज ज्वाला थी यही कारण है कि उनके विचारों से हमें पे्ररणा, नव चेतना तथा स्फूर्ति प्राप्त होती है, हमारे अतःकरण में आलोकित प्रस्फुटित ज्वाला प्रज्जवलित होती है। ’’उनके विचार शिक्षा और दर्शन इतने प्रभावी हैं कि स्वामी जी के द्वारा दिए गए सैकड़ांे वक्तव्यों में से कोई एक वक्तव्य महान् क्रांति करने के लिए, व्यक्ति के जीवन में आमूल परिवर्तन करने में समर्थ है ’’।1
स्वामी विवेकानंद का जीवन दर्शन
स्वामी जी का जीवन दर्शन वास्तव में भारत का वास्तविक जीवन दर्शन है। स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था, उनका जन्म 12 जनवरी 1863 ई. में कलकता के अभिजात क्षत्रिय परिवार में हुआ। सन 1881 में उनकी मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई । सन 1886 में श्री रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के समय विवेकानंद उनके सर्वप्रिय शिष्य थे। अब विवेकानंद जी लंबी यात्राएॅ प्रारंभ की । ’’वे भारतीय संस्कृति के सभी महत्वपूर्ण केन्द्रों में गए और हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक इस विशाल देश का कोना-कोना छान मारा। उनकी कुशाग्र बुद्धि और संवेदनशील हदय ने हजारों बातें आत्मसात की ’’। 2
सन् 11 सिंतबर 1893 ई. में शिकागों (अमरीका) के विश्व धर्म सम्मेलन में वे भारत के प्रतिनिधि बनकर गए । उन्हांेने हिन्दू धर्म का आध्यात्मिक आधार पर सम्मलेन में जीवंत विवेचन दिया । इस विवेचन के समक्ष पश्चिमी धर्मों का दिवालियापन स्पष्ट हो गया । जिस स्पष्टता और सूक्ष्मता से विवेकानंद ने ’वेदांत’ की व्याख्या की पाश्चात्य विद्धानों को यह जीवन का अंतिम सत्य मालूम पड़ने लगा । स्वामी जी ने अनेक देशों का भ्रमण किया। उस भ्रमण के दौरान वे अनेक व्यक्तियों से मिले एवं अनेक समस्याओं ,रीति-रिवाजांे, संस्कृतियों तथा परिस्थितियों का प्रत्यक्ष परिचय प्राप्त किया। 4 जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद की मृत्यु हो गई । स्वामी जी एक महान राष्ट्रवादी ,देशभक्त तथा विश्व-बंधुत्व की भावना से ओत-प्रोत थे ।
संस्कृति के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद का दर्शन
स्वामी विवेकानंद जी प्राचीन भारतीय संस्कृति के केवल मानने वाले ही नही बल्कि उनके सच्चे उपासक भी थे। स्वामी जी ने भारत के जन-समुदाय के सामाजिक ,धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को निकट से देखा तथा समझा था। इस जानकारी के पृष्ठभूमि में ही उनका दार्शनिक चिन्तन का उद््भव हुआ । स्वामी जी भारतीय संस्कृति के प्राचीनता और महत्व को जानने और समझने के लिए भारत वासियों को सदैव प्रेरित करते रहे। संस्कृति के संदर्भ में उनका मानना था कि ’’वैदिक संस्कृति भारत की आत्मा है और यहाॅ की आध्यामिकता (भारत वर्ष ) इन का मेरूदण्ड हंै ’’।3 स्वामी जी मानते थे कि जब व्यक्ति संस्कारवश अच्छे कार्य करता है तभी उसका चरित्र गठित होता है । वे कहते थे कि बुराईयों का कारण मनुष्य में ही निहित है, किसी देैवीय सत्ता में नही । मनुष्य रेशम के कीडं़े के समान है वह अपने आप से ही सूत निकालकर कोष बना लेता है और फिर उसी में बंदी हो जाता है । इस जाल को व्यक्ति स्वयं ही नष्ट कर सकता है कोई दूसरा नहीं। वे कहते थे ’ तुम्हारे अंदर जो कुछ है अपनी शक्तियों द्वारा उसका विकास करो पर कभी भी दूसरों का अनुशरण करके नही। वे नवयुवकों को ध्येयवादी होने निरंतर प्रेरणा देते रहते थे । वे भारत को ’ अमर भारत’ की संज्ञा देते थे। स्वामी जी हमेशा कहते थे कि यदि भारतवासियों ने पाश्चत्य भौतिकवादी सभ्यता के चक्कर में पड़कर आध्यात्मिकता का आधार त्याग दिया तो उनके परिणाम स्वरूप तीन पीढ़ियों में ही उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, जिसका सीधा परिणाम होगा सर्वतोन्मुखी सत्यानाश । स्वामी जी कहते थे कि अन्य व्यतियों से हम जो लेना चाहें ले ग्रहण करें किन्तु उसे जीवन के आदर्श के अधीन करेे । स्वामी विवेकानंद का दर्शन दूरदृष्टि था उनके विचारों में दिव्यता झलकती थी वे जो भी कहते थे बिल्कुल सटीक और मानव के भवनाओं व मास्तिष्क पर सीधे पहुॅचने वाले होते थे। स्वामी जी ने भारतीय संस्कृति के विषय में जो भी कहा आज हमारे सामने परिणाम स्वरूप प्रकट हो रहे है । क्योंकि भारतीय संस्कृति की मधुरता पवित्रता और महक धीरे-धीरे लुप्तता के कगार पर खड़ी दिखाई पड़ने लगी है भारतीय संस्कार और परंपरा जो प्रत्येक रिश्ते-नाते की पवित्रता बनाए रखती थी आज के परिदृश्य में भारत माॅ के दामन में क्रूरता के बीज बो रही है, क्योंकि आज की आधुनिकता ने मानवता के पवित्र रिश्ते को दागदार कर दिया है । प्राचीन भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ पर गहरा प्रहार किया है, क्योंकि खून के रिश्ते अब खून के प्यासे हो गये है बेटे बाप के, भाई-भाई के, माॅ-बेटी के बीच नफरत की दीवार खड़ी दी है जो कि मानवता के लिए अत्यंत हानिकारक है। इसका मूल कारण है भारतीय संस्कृति को तुच्छ जानना और आधुनिकता के नशें मे चूर विदेशी सभ्यता और संस्कृति को आत्मसात् कर लेना। भारतीय संस्कृति, ज्ञान ओर संस्कारों को त्याग देना मूल कारण है । स्वामी विवेकानंद जी एक सौ दस वर्ष पहले जो आशंका जताई थी वह आज हमें देखने को मिल रहा है। ’’स्वामी विवेकानंद एक सच्चे वेदांती थे वह सत्य के अनुपालन के समर्थक थे और उनकी दृष्टि में सत्य वही है जिससे व्यक्ति एवं समष्टि दोनों का हित हो उन्हांेनें प्राचीन भारतीय वेैदिक संस्कृति को जीवन के शाश्वत मूल्यों के रूप में स्वीकार किया ’’।4 अब हमारे समक्ष प्रश्न यह उठता है कि क्या हम सच्चे मायने में भारतीय हैं और भारत के मूल संस्कृति को अपने में समाहित किए हुए है ? मित्रों हमारे पास अभी-भी अवसर है सनातन ,वैदिक संस्कृति को समझने, जानने और आत्मसात् कर लेने की। हमारे मूल सांस्कृतिक गरिमा को अपने में पुनर्जिवित करने की । स्वामी विवेकानंद जी के दर्शन और उच्च विचारधारा को स्वीकार करके राश्ट्र और समाज के प्रत्येक व्यक्तियों में सांस्कृतिक एकता और जागृति लाने की है। हे जवानों उठो, ये देश है तुम्हारा माॅ भारती पुकारती है अपनी सच्ची संस्कृति को पहचानों और मानसिक दासता के बोड़ियों से स्वतंत्र हो जाओं । मित्रों वास्तव में संस्कृति हमेशा विशिष्ट होती है और दूसरे प्रतिबद्ध उतराधिकारी समाज, विशिष्ट समाज होता है। संस्कृति लोगों की जीवन रीति है एक संस्कृति व्यवहार की वह व्यवस्था है जिसमें किसी समाज के सदस्य सहभागी होते है और समाज वह जनसमूह है जो एक सर्वनिष्ट संस्कृति है जिसमें मानव के जीवन मूल्य और ज्ञान का असीम भण्डार है। जीवन मूल रहस्य को यदि जानना है तो वैदिक संस्कृति का ज्ञान आवश्यक है।’’ मानव जीवन के इतिहास को जानने का सबसे प्राचीन साहित्य ‘वेद‘ है विश्व के इतिहास में अति प्राचीन और प्रमाणित साहित्य है ’’। 5
शिक्षा के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद का दर्शन
स्वामी विवेकानंद जी ऐसे परम्परागत व्यवसायिक तकनीकी शिक्षा शास्त्री न थे जिन्हांेने शिक्षा का क्रमबद्ध सुनिश्चित विवरण दिया हो। वह मुख्यत: एक दार्शनिक ,देशभक्त, समाज सुधारक और दिव्यात्मा थे जिनका लक्ष्य अपने देश और समाज की खोयी हुई जनता को जगाना तथा उसे नव निर्माण के पथ पर अग्रसर करना था। शिक्षा दर्शन के क्षेत्र में स्वामी जी की तुलना विश्व के महानतम्् शिक्षा शास़्ित्रयों प्लेटो, रूसों, और बट्रैण्ड रसेल से की जा सकती है क्योंकि उन्होंने शिक्षा के कुछ सिद्धांत प्रस्तुत किए है जिनके आधार पर विशाल ज्ञान का भवन निर्माण तकनीकी रूप से कर सकते है । स्वामी जी के शैक्षिक विचार भी उनकी वेदांत विचारधारा से प्रेरित है। उनका मुख्य उद्देश्य थे मानव का नवनिर्माण क्योंकि व्यक्ति समाज का मूल आधार है । व्यक्ति के सर्वागीण उत्थान से समाज का सर्वागीण उत्थान होता है और व्यक्ति के पतन से समाज का पतन होता है स्वामी जी ने अपने शिक्षा दर्शन में व्यक्ति और समाज दोनों के समरस संतुलित विकास को ही शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य माना । स्वामी जी के अनुसार वेदांत दर्शन में प्रत्येक बालक में असीम ज्ञान और विकास की सम्भावना है परन्तु उसे इन शक्तियों का पता नहीं है । शिक्षा द्वारा उसे इनकी प्रतीति कराई जाती है तथा उनके उत्तरोतर विकास में छात्र की सहायता की जाती है । स्वामी जी वेदांती थे इसलिए वे मनुष्य को जन्म से पूर्ण मानते थे और इस पूर्वता की अभिव्यक्ति को ही शिक्षा कहते थे । स्वामी जी के शब्दों में ’’ मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को व्यक्त करना ही शिक्षा है’’6 स्वामी विवेकानंद लोगों का नैतिक गुणों तथा व्यक्ति के गौरव के समर्थक थे ।
स्वामी विवेकानंद शिक्षा के विषय में कहतेे है कि सच्ची शिक्षा वह है जिससे मनुष्य की मानसिक शक्तियों का विकास हो। वह शब्दों को रटना मात्र नहीं है। वह व्यक्ति की मानसिक शक्तियों का ऐसा विकास है , जिससे वह स्वयंमेव स्वतंत्रतापूर्वक विचार कर ठीक-ठीक निर्णय कर सकें। इक्कसवीं शताब्दी के बदलते परिवेश में जहाॅ सूचना और प्रौद्योगिकी का युग चल रहा है वहाॅ भारत की वर्तमान शिक्षा पद्धति महज उपब्धियाॅ वितरण करने के अतिरिक्त और कोई विशेष उपलब्धि प्राप्त नही की गई हंै वहाॅ स्वामी जी के चिंतन को अपनाना आवश्यक है । स्वामी जी शिक्षा के वर्तमान रूप को अभावात्मक बताते थे जिनके विद्याथियों को अपनी संस्कृति का ज्ञान नही होता, उन्हें जीवन के वास्तविक मूल्यों का पाठ नही पढ़ाया जा सकता तथा उनमे श्रद्धा का भाव नही पनपता है । स्वामी जी का मानना था कि भारत के पिछडे़पन के लिए वर्तमान शिक्षा पद्धति भी उत्तरदायी है । यह शिक्षा न तो उत्तम जीवन जीने की तकनीक प्रदान करती है और न ही बुद्धि का नैसर्गिक विकास करने में सक्षम है । स्वामी जी आधुनिक शिक्षा पद्धति की अलोचना करते हुए लिखा ’’ ऐसा प्रशिक्षण जो नकारात्मक पद्धति पर आधारित हो, मृत्यु से भी बुरा हैं।7 ’’ बालक स्कूल में जाता है और पहली बात सीखता है कि उसका पिता मूर्ख है, दूसरी बात सीखता है कि उसका बाबा पागल है, तीसरी बात कि उसके सभी शिक्षक पाखण्डी हैं , चैथी कि सभी पवित्र ग्रंथ झूठे है । 16 वर्ष के होतेे-होतेे तो विद्यार्थी निषेधों का एक समूह, अस्थिहीन और जीवनहींन बन जाता है यही कारण है कि पचास वर्षो में भी यह शिक्षा एक भी मौलिक व्यक्ति उत्पन्न नही कर सकी। प्रत्येक व्यक्ति जिसमें मौलिकता नही है, उसे देश में नही बल्कि कही ओैर पढ़ाया गया है अथवा फिर से अन्धविश्वासों से मुक्त होने के लिए अपने देश के पुरातन शिक्षालयों में जाना पड़ा है। स्वामी विवेकानंद भारतीयों के लिए पाश्चात्य दृष्टिकोण से प्रभावित शिक्षा पद्धति को उचित नही मानते थे ।’’ वे शिक्षा की भारतीय पद्धति गुरूकुल पद्धति को श्रेष्ठ मानते थे जिसमें विद्यार्थियों तथा शिक्षकों में निकटता के संबंध तथा सम्पर्क रह सके और विद्यार्थियोें के श्रद्धा, पवित्रता, ज्ञान, धैर्य, विश्वास, विनम्रता, आदर आदि श्रेष्ठ गुणों का विकास हो सकें’’।8 स्वामी जी भारतीय शिक्षा पाठयक्रम में दर्शनशास़्त्र एवं धार्मिक ग्रथों के अध्ययन को भी आवश्यक मानते थे वे ऐसी शिक्षा के समर्थक थे जो संकीर्ण मानसिकता तथा भेदभाव साम्प्रदायिकता दोषों से मुक्त हो । स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा के मूल उदेश्य, जिसमें व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो । उतम चरित्र ,मानसिक शक्ति और बौद्धिक विकास हो, जिसमें व्यक्ति पर्याप्त मात्रा में धन अर्जित कर सके और आपात काल के लिए धन संचय कर सके । संक्षेप, में स्वामी जी का शिक्षा दर्शन मानव निर्माण, चरित्र निर्माण शारीरिक विकास, बैद्धिक विकास, मानसिक विकास, उत्तम चिंतन एवं आत्मविश्वास का विकास, एकाग्रता शक्ति का विकास, आध्यामिक गुणों का विकास , स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास करना था। वर्तमान शिक्षा पद्धति एवं समाज में नैतिक गुणों का ह्ास हुआ है उसे स्वामी जी के विचारों को अपनाकार ही समाप्त किया जा सकता है।
धर्म के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद का दर्शन
स्वामी विवेकानंद मानव धर्म को सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते थे, धर्म के संदर्भ में उनके विचार अत्यंत आकर्षक एवं ह्ृदयस्पर्शी थे । उनके अनुसार ’’ धर्म मनुष्य के चिंतन और जीवन का सबसे उच्च स्तर है ।’’9 हम देखते है कि मानव प्रेम एवं धर्म जगत में इन दो ही शक्तियों की क्रिया सबसे अधिक प्रस्फिुट हुई है। मानवता को जिस तीव्रतम प्रेंम का ज्ञान है, वह धर्म से ही प्राप्त हुआ है , और वह घोरतम पैशाचिक घृणा भी, जिसे मानवता ने कभी अनुभव किया , वह भी धर्म से ही प्राप्त हुई है । संसार ने कभी महानतम् शांति की जो वाणी सुनी है , वह धर्म राज्य के लोगों के मुख से निकली हुई है और जगत ने कभी भी जो तीव्रतम भत्र्सना सुनी है, वह भी धर्म राज्य के मनुष्यों के मुख से उच्चरित हुई है। किसी धर्म का उद्धेश्य जितना ही उच्च होता है , उसका संगठन जितना ही सूक्ष्म होता है, उसकी क्रियाशीलता भी उतनी ही अद्भूत होती है । धर्म प्रेरणा से मनुष्यों ने संसार में जो खून की नदियाॅ बहायी है , मनुष्य के हृदय की और किसी प्रेरणा ने वैसा नही किया । और धर्म पे्ररणा से मनुष्यों ने जितना चिकित्सालय, धर्मशाला, अन्न क्षेत्र आदि बनाये उतने और किसी प्ररेणा से नहीं । मनुष्य हदय की और कोई वृत्ति उसे, सारी मानव जाति की ही नही निकृष्टतम प्राणियों तक की सेवा करने को प्रवृत्त करती । धर्म प्रेरणा से मनुष्य जितना निष्ठुर हो जाता है, उतना और किसी प्रेरणा से नही, उसी प्रकार, धर्म प्रेरणा से मनुष्य जितना नम्र हो जाता है उतना किसी और प्रवृत्ति से नही।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार भारतवासियों को ऐसे धर्म की आवश्यकता नही है जो कमजोरी पैदा करें। उनका मानना था कि इस संसार में नायात्मा बलहीने लक्ष्यः ;ज्ीम मंा कवमे दवज हमज दलजीपदह पद जीपे वतसक द्ध अर्थात कमजोर को इस संसार में कुछ भी प्राप्त नही होता । इस प्रकार स्वामी जी ने भारतीयों को अभयम् व शक्तिषाली बनने का सुझाव दिया । स्वामी जी धर्म को मानव शक्ति का स्रोत्र मानते थे । वे ऐस धर्म को नही मानते थे जो कायरता सिखाता हो। उनका कहना था कि स्वयं अपने में विश्वास रखो। स्वामी जी ने भारतीयों को उद्बोधित करते हुए कहा है कि ’’ यह समय न तो रोने का है और न खुशियाॅ बनाने का है’’। यह समय कमजोरी दिखाने का भी नही है । यह कमजोरी इस हद तक हो गई है हम रूई के ढेर की तरह कमजोर हो गए है। आज हमारे देश को लौह पुरूषों तथा दृढ़ इच्छाशक्ति के लोगों की आवश्यकता है जिन्हेें अपने लक्ष्य प्राप्ति से कोई रोक न सकें। चाहे इन्हें उसके लिए समुद्र की सतह में क्यों न जाना पडे़ अथवा मृत्यु का सामना क्यों न करना पडे़।’’ स्वामी विवेकानंद का मानना था कि प्रत्येक धर्म के मूल तत्व समान है’’। हिन्दू वैदिक धर्म विवेकानंद के अनुसार नैतिक मानववाद तथा आध्यात्मिक आदर्शवाद के सार्वभौमिक तत्वों का संदेश देता है। प्राचीन हिन्दू वैदिक धर्म के अन्तर्गत मानवता के कल्याण के लिए जो नैतिक तथा आध्यात्मिक समादेश दिए गए है जिनका स्वरूप सार्वभौमिक है । स्वामी विवेकानंद का धर्म सर्व धर्म है वे किसी एक धर्म के पक्षधर नही थे बल्कि प्रत्येक धर्म के मूल, सारत्व मानव कल्याणकारी अनिवार्य उपयोगिता जो मानव को सच्चे धार्मिकता प्रदान करते हो के मानने वाले थे। सार्वभौमिक धर्म के संदर्भ में उनका कहना था कि ’’ धर्म की सार्वभौमता धर्म का सार है’’।10 सार्वमौम धर्म की सार्वभौमता मूलत: दो अनविार्य लक्षणों पर आधारित होती है- एक बात तो यह कि धर्म सार्वभौम तभी हो सकता है जब इसका द्वार सबके के लिए खुला रहे।’’ दूसरी बात’’ ऐसे र्सार्वभौम धर्म में यह शक्ति होनी चाहिए कि वह विभिन्न धार्मिक संस्थाओं को संतुष्ट एवं तृप्त कर सके। सार्वभौम धर्म किसी धर्म की उपेक्षा ना करके आपसी मतभेदों और विवादों से ऊपर उठकर विभिन्न धर्म संस्थाओं को भी ’’सार’’ या सार्थकता दिखाई दे।’’11 धर्म को यह बात देखनी है कि नवजात शिशु अबोध तथा निर्दोष है, वह किसी धर्म के साथ पैदा नही होता, मानव जीवन में सामान्यतः हम देखते है कि हिन्दू माॅ-बाप का बच्चा हिन्दू धर्म को स्वीकारता है तथा मुस्लिम माॅ-बाप का बच्चा इस्लाम को ही स्वीकारता है। ऐसा इसलिए होता है कि बचपन से ही उसकी शिक्षा-दीक्षा उसके सामाजिक जीवन, उनका परिवेश उसे एक विशेष धर्म की ओर उन्मुख कर देता है। किन्तु धर्म में यह नही कहा जाता है कि बच्चा किसी धर्म को लेकर पैदा होता है। यह तो बाद में उसकी अभिरूची एवं मनोवृत्ति पर निर्भर करता है कि वह किस धर्म को स्वीकार करें। धर्म का चयन तो व्यक्ति के अपने स्वतंत्र निर्णय पर आधृत है। अतः धर्मो की सार्वभौमता की एक पहचान यह है कि उसके द्वार हर धर्म के व्यक्ति के लिए खुले रहे। हर धर्म व्यक्ति के लिए खुल जाने से यह सार्वभौम धर्म कहलाता है। स्वामी जी कहते है कि जिस प्रकार , विश्व बंधुत्व के संबंध के कहा जा सकता है विश्व बंधुत्व वास्तविक है ठीक उसी प्रकार सार्वभैाम धर्म के संबंध में कहा जा सकता है कि सार्वभौम धर्म भी वास्तविक है । स्वामी विवेकानंद धर्म को सार्वभौम धर्म कहते है’’।12 धर्म को वे मानव जाति को एकता के सूत्र में बांधने वाली शक्ति के रूप में मानते थे । स्वामी विवेकानंद का चिंतन केवल एक देश या एक धर्म विशेष तक सीमित नही था बल्कि उसकी सरहरी (सीमा में) में संपूर्ण विश्व का मनुष्य समाज समाया हुआ था वे वृहत्तर संसार के भातृत्व में भी सभी धर्मो की सार्थकता मानते थे। अपने इस विश्व दृष्टि के कारण विवेकानंद यह मानते थे कि भारत की प्रगति समूचे विश्व की प्रगति से संबंद्ध है। स्वामी जी का कहना था कि हमें ऐसा धर्म चाहिए जो मनुष्य का निर्माण करने वाला हो उन्हें कमजोर नही बल्कि सबल बनाने वाला होना चाहिए। उन्हांेनें सर्वश्रेष्ठ और उॅचा धर्म मानव की सेवा को माना इस संबंध मे उनका विश्व विख्यात प्रिय नारा’’ मानव की सेवा करना ईश्वर की सेवा और आराधना करना है’’। गरीबों की सेवा ही ईश्वर सेवा है’’।13 ईश्वर या देवता की दिव्यता कोई नई और बड़ी बात नही है , बड़ी बात तो तब है जब मानव में भी दिव्यता हो। स्वामी विवेकानंद सार्वभौम धर्म के द्वारा राष्ट्रीय एकता को सशक्त करना चाहते थे। अतः आज हमें स्वामी जी के विचारों का गहराई से चिंतन मनन करने की आवश्कता है, जिससे हममें से प्रत्येक में सत्य, आत्मा की विशुद्धता निष्कपट तथा देैैवीय प्रकृति से युक्त गुणों का विकास कर नव मानव का निर्माण करना आवश्यक है।
निष्कर्ष
स्वामी विवेकानंद का विचार, दर्शन और शिक्षा अत्यंत उच्चकोटि के है जीवन के मूल सत्यों, रहस्यों और तथ्यों को समझने की कुंजी है। उनके शब्द इतने असरदार है कि एक मुर्दे में भी जान फूॅक सकता है। वे मानवता के सच्चे प्रतीक थे, है और मानव जाति के अस्तित्व को जनसाधारण के पास पहुॅचाने का अभूतपूर्व कार्य किया।’’ वे अद्धैेत वेंदंात के प्रबल समर्थक थे। भारतीय संस्कृति एवं उनके मूल मान्यताओं पर दर्शन आधारित जीवन शैली अपनाने तथा आपनी संस्कृति को जीवित रखने हेतु भारतीय संस्कृति के मूल अस्तित्व को बनाए रखने का आह्वान किया ताकि आने वाली भावी पीढ़ी पूर्ण संस्कारिक, नैतिक गुणों से युक्त, न्यायप्रिय, सत्यधर्मी तथा आध्यात्मिक और भारतीय आदर्श के सच्चे प्रतीक के रूप में विश्व में उॅचा स्थान रखें’’। वर्तमान में आज के युवा पीढ़ी के लिए यह आवश्यक हैे कि वे अपने मूल संस्कृति से परिचित होवे और नैतिक गुणों से भरपूर होकर सच्चे भारतीय होने के गौरव को बनाए रखें। आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति और जीवन शैली के आडम्बर में न फंसकर थोेडंे दिनों के सुख के लिए बहुमूल्य जीवन का नाश न करें। स्वामी जी के आदर्शों पर चलने हेतु दृढ़ प्रतिज्ञ रहें और शिक्षा के मूल्य को समझे गुरू को उचित आदर सम्मान दें, भौतिकता के अंधे दौड़ में मौलिकता का त्याग न करें। शिक्षा जैसी पवित्र प्रकाश जो अज्ञानता के बंधन से मुक्ति दिलाती है और जीवन के दुःखों से छुड़ाकर सुखमय ज्योतिर्मय जीवन प्रदान करती है। गुरू-शिष्य के पवित्र रिश्तों को कलंकित न करें। नैतिक आदर्शो पर चलने हेतु दृढ़ संकल्पित हो ताकि विश्व के भूपटल पर भारतीय होने के गौरव का छाप सुनहरें अक्षरों में सदैव अंकित रहें। धर्म के संबंध में जो स्वामी जी ने हमें मार्ग बताया उन पर अमल करें और साम्प्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता, घृणा, भेदभाव, जात-पात, छुआ-छूत जैसी संकीर्ण मानसिकता व विचारों से उपर उठकर धार्मिक सहिष्णुता को हदय में जगह दें। ईश्वर एक है और हम सब उसी के संतान है इसलिए मानवता की सेवा को व मानव प्रेम को दिल में पहला स्थान दें। यह सब तभी संभव होगा जब हम सचमुच स्वामी विवेकानंद के बताये हुए मार्ग पर चलेंगे। स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और आदर्शो पर चिंतन करेें सत्य को समझने की कोशिश करेंगे। खुद को सर्वश्रेष्ठ समझकर या अधिक बुद्धिमान जानकर स्वयं को धोखे में न रखें बल्कि वर्तमान में हम किस रास्ते में जा रहें हैं जिसका परिणाम क्या होगा ? विचार करें। स्वामी जी के कार्यो को स्मरण करें और अपनी मातृभूमि माॅ भारती के खोई हुई गौरव को समस्त भारतवासी मिलकर और दृढ़ संकल्प लेकर वापस लाने का प्रयास करें। यही स्वामी जी को सच्ची श्रद्धाजंली होगी और माॅ भारती के प्रति सच्चा समर्पण। संस्कृति देश की धरोहर व पहचान है शिक्षा ज्योंति है। धर्म मानव होने का प्रतीक है। इसालिए संस्कारिक चरित्रवान उत्तम गुणों से अपने को सजायंे। शिक्षा के द्वारा देश के विकास को चरम पर ले जावें। और सर्व धर्म के द्वारा सच्चे मानवता को अपनाकर ईश्वर की सेवा करें। तो आइए हम एक होकर राष्ट्रीय नवचेतना जगाएं, नए समाज एवं ,नवयुग, का निमार्ण करें।
संदर्भ ग्रंथ
1.
गुप्त, राजेन्द्र प्रसाद (1997) ’’स्वामी विवेकानंद: व्यक्ति और विचार’’ प्रकाशक -राधा पब्किकेशन 4378/4ठ अंसारी रोड, दरियागंज नई दिल्ली - 110002 प्रसंस्करण
2.
स्वामी, व्योमरूपानन्द ’’विवेकानंद संचयन’’ रामकृष्ण मठ नागपुर
3.
स्वामी निखिलानंद (2005)’’ विवेकानंद एक जीवनी’’ प्रकाशक स्वामी बोधसारानन्द , अध्यक्ष अध्दैत आश्रम , मायावती, चम्पावत, उत्तरांचल कोलकाता स्थित प्रकाशन विभाग द्वारा प्रथम संस्करण।
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Received on
11.07.2012
Revised on
05.08.2012
Accepted on
12.08.2012
© A&V
Publication all right reserved
Research
J. Humanities and Social Sciences. 3(3): July-September, 2012, 381-385